Bekhudi-Shayari
बेख़ुदी ले गई कहाँ हम को, देर से इंतिज़ार है अपना।
दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी, 'अख़्तर' वो बेख़ुदी के ज़माने किधर गए।
बे-ख़ुदी में हम तो तेरा दर समझ कर झुक गए, अब ख़ुदा मालूम काबा था कि वो बुत-ख़ाना था।
बेख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़, ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था।
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो, बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो।
कई ख़्वाब मुस्कुरायें आज फिर सरेआम बेखुदी में , मेरे लबों पे आ गया जान तेरा नाम बेखुदी में।
होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है, इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है।
मोहब्बत नेक-ओ-बद को सोचने दे ग़ैर-मुमकिन है, बढ़ी जब बेख़ुदी फिर कौन डरता है गुनाहों से।
मय से ग़रज़ नशात है किस रू-सियाह को, इक-गूना बेख़ुदी मुझे दिन रात चाहिए।
बेख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब' कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है।
गई बहार मगर अपनी बेख़ुदी है वही, समझ रहा हूँ कि अब तक बहार बाक़ी है।
ऐ बे-ख़ुदी-ए-दिल मुझे ये भी ख़बर नहीं, किस दिन बहार आई मैं दीवाना कब हुआ।
जिस में हो याद भी तिरी शामिल, हाए उस बेख़ुदी को क्या कहिए।
बेखुदी वो नहीं कि हम, तेरे तसव्वुर में खो जाएं, यकीनन बेखुदी वो है. कि तुझको भूल ना पाएं।
कई ख़्वाब मुस्कुरायें सरेआम बेखुदी में , मेरे लबों पे आ गया जान तेरा नाम बेखुदी में।
सीधी बात शोहरत की बेख़ुदी का मज़ा आप जानिए, इज़्ज़त की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए।
बेखुदी में बस एक इरादा कर लिया, इस दिल की चाहत को हद से ज्यादा कर लिया, जानते थे वो इसे निभा न सकेंगे पर, उन्होंने मजाक और हमने वादा कर लिया।
कुछ ऐसी है यार, तेरे इश्क़ की बेखुदी , इक तुझे ही लिखने को, हर्फ मचल यूँ जाते है।
तेरी बेखुदी में लाखो पैगाम लिखते है, तेरे गम में जो गुजरी बात तमाम लिखते हैं, अब तो पागल हो गई वो कलम, जिस से हम तेरा नाम लिखते है।
हमारी बेखुदी का हाल वो पूछे अगर तो कहना, होश बस इतना है की तुमको याद करते है।
बेखुदी कि जिन्दगी जिया नही करते, जाम दुसरो का छिन कर पिया नही करते, उनको मुहब्बत है तो आ के इजहार करे , पीछा हम भी किसी का किया नही करते।
बेखुदी जिंदगी हर पल लाजवाब की तलाश है, शायरी की खुशनुमा बेखुदी में आये अजनबी दोस्त।
क़ोई ख्वाब मुस्कुराये सरे शाम बेखुदी में, मेरे लब पे आ गया था तेरा नाम बेखुदी में।
आँखों में तेरे इश्क की मदहोशियाँ लिए, हम तुझ को सोचते है बड़ी बेखुदी के साथ।
खुलते बंद होते लबों की ये अनकही, मुझसे कह रही हैं के बढ़ने दे बेखुदी।
मुझसे नहीं कटती अब ये उदास रातें, बेखुदी मे कल सूरज से कहूँगा मुझे साथ लेकर डूबे।
आपकी याद आती रही रात भर, बेखुदी में हंसाती रही रात भर, चांद मेरे संग सफर में ही रहा, चांदनी गुनगुनाती रही रात भर।
तेरी बेखुदी में लाखो पैगाम लिखते है, तेरे गम में जो गुजरी बातें तमाम लिखते है, अब तो पागल हो गई वो कलम, जिस से हम तेरा नाम लिखते है।