Zikr-Shayari
तेरा ज़िक्र मेरी इबादत हैं सनम, मत रोको दुनिया वालों मेरा सनम ख़ुदा है।
जिक्र अधूरी मोहब्बत का, किसी से ना करना, मैं खुद सबसे कह दूंगा की, उन्हें फुरसत नही मिलती।
दिल में तेरी ही यादें हैं जुबां पे तेरा ही ज़िक्र है, मैं कहता हूँ ये इश्क़ है तू कहती है बस फ़िक्र है।
ये तेरा ज़िक्र है या इत्र है, जब-जब करती हूँ, महकती हूँ, बहकती हूँ, चहकती हूँ।
न ज़िक्र तक करते कभी हम अपनी ज़ुबान से, पर सोचा बिना सितम के भी क्या दास्तां होगी।
सारी सारी रात सितारों से उसका ज़िक्र होता है, और उसको ये गिला है के हम याद नहीं करते।
पूछा न जिंदगी में किसी ने भी दिल का हाल, अब शहर भर में ज़िक्र मेरी खुदकुशी का है।
जो सामने जिक्र नही करते, वो दिल ही दिल मे बहुत फिक्र करते हैं।
जरूरत नहीं फिक्र हो तुम, कर ना पाऊँ कहीं भी, वो जिक्र हो तुम।
फ़िक्र तो तेरी आज भी है, बस जिक्र का हक नही रहा।
उस ख़्याल पर ही मुझे, प्यार आ जाता है, ज़िक्र जिसमें तेरा, इक बार आ जाता है।
छू गया जब कभी ख्याल तेरा, दिल मेरा देर तक धड़कता रहा, कल तेरा ज़िक्र छिड़ गया घर में, और घर देर तक महकता रहा।
भर जायेंगे ज़ख़्म भी तुम ज़माने से ज़िक्र ना करना, ठीक हूँ मैं तुम मेरे दर्द की फिकर ना करना।
है एहतराम भी लाज़िम कि, ज़िक्र है उनका।
मेरी शायरी में सनम. तेरी कहानी है, जिसके आधे हिस्से मे तेरा ज़िक्र आधे में मेरी दीवानगी है।
तू न कर ज़िक्र-ए-मोहब्बत कोई गम नहीं, तेरी ख़ामोशी भी सच बयाँ कर देती है।
ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं, याद हम आएँगे दुनिया को हवालों की तरह।
जहाँ भी ज़िक्र हुआ प्यार का वहीं तुमसे नज़र मिलाने की तलब लगी।
कुछ इस तरह वो मेरी बातों का ज़िक्र किया करती है, सुना है वो आज भी मेरी फिक्र किया करती है।
आजमाते हैं लोग सब्र मेरा, करके बार बार जिक्र तेरा।
मोहब्बत की महफ़िल में आज मेरा ज़िक्र है, अभी तक याद हूँ उसको खुदा का शुक्र है।
मुझे पढ़ते रहना, चुपके से तेरा ज़िक्र करुगी एक दिन।
अब तेरा ज़िक्र नही, अब तेरी फ़िक्र नही, क्यू की तू वो नही रहा, जिससे मैने, मोहब्बत की थी, अब तू बन चुका है वो, जिसके बारे मैने कभी सोचा भी नही।
म्हारी फिक्र और, जिक्र करने के लिए, हमारा कोई रिश्ता ही हो, ये जरूरी तो नहीं?
ज़िक्र तेरी फ़िक्र, तेरा एहसास तेरा ख्याल, तू खुदा तो नहीं , फिर हर जगह क्यों हैं?
कुछ बुरे लोगो का ज़िक्र करने से अच्छा, कुछ अच्छे लोगो की फ़िक्र कर लू।
तेरे इश्क से मिली है, मेरे वजूद को ये शौहरत, मेरा ज़िक्र ही कहाँ था, तेरी दास्ताँ से पहले।
तेरा ज़िक्र तेरी फिक्र, तेरा एहसास तेरा ख्याल, तू खुदा नहीं फिर, हर जगह मौज़ूद क्यूँ है?
ज़िक्र अपनी हर बात में लाता है मेरा, भूला नहीं है वो मुझे बेवफ़ा होकर भी।
ज़िक्र तेरा ही चल रहा है, यूँ ही तो नही मुस्कुराय़े हैं हम।
ज़िक्र तेरा है या कोई नशा है, जब जब होता है दिल बहक जाता है।
तेरा हुआ ज़िक्र तो हम, तेरे सजदे में झुक गये, अब क्या फर्क पड़ता है, मंदिर में झुक गये या मस्जिद में झुक गये।
भरी महफिल में मोहब्बत का जिक्र हुआ, हमने तो बस आप की ओर मुड़कर देखा, और लोग वाह-वाह करने लगे।
मेरी मोहब्बत की ना सही, मेरे सलीके की तो दाद दे सनम, तेरा जिक्र रोज करते हैं, तेरा नाम लिए बगैर।
ज़िक्र उनका ही आता है मेरे फ़साने में, जिनको जान से ज्यादा चाहते थे हम किसी ज़माने में, तन्हाई में उनकी ही याद का सहारा मिला, जिनको नाकाम रहे हम भुलानें में।
कोरे काग़ज़ सी ज़िंदगी पर जो भी लफ़्ज़ उकेरे हैं, इनमे ज़िक्र सिर्फ़ उनका है जो मेरे ना होकर भी मेरे हैं।
साथ दे पाना ना दे पाना अपनी जगह, फ़िक्र करना, ज़िक्र रखना अपनी जगह।
सनम अहसास मेरा तेरी पलकों में है वरना, इतनी नादान तेरी आँखे नहीं, जो मेरा जिक्र हो और झुक जाए।
प्यार करते हो मुझसे तो इज़हार कर दो, अपनी मोहब्बत का जिक्र सरेआम कर दो, नही करते अगर प्यार तो इन्कार कर दो, ये लो मेरा मासूम दिल इसके टुकड़े-हजार कर दो।
ज़िक्र करता है दिल सुबह शाम तेरा, गिरते हैं आँसू बनता है नाम तेरा, किसी और को क्यों देखे ये आँखें, जब दिल पे लिखा सिर्फ नाम तेरा।
तेरा ज़िक्र जिसमें हुआ ना हो, मेरे पास ऐसा लम्हा ना हो, मैंने जिसमें तुझको माँगा नहीं, मेरे लब पे ऐसी दुआ ना हो।
जहाँ भी ज़िक्र हुआ सुकून का, वहीँ तेरी बाहोँ की याद आयी।
जिक्र तो छोड़ दिया मैंने उसका, लेकिन कम्बख्त फिक्र नहीं जाती।
उलझन में हूं या दुख में हूं, दोस्त है मेरा फिक्र करेगा, दूर है फिरभी भूलेगा नही, कभी तो मेरा जिक्र करेगा।